
पुलिस अत्याचार ड्यूटी का हिस्सा नहीं—हिमाचल हाईकोर्ट का सख्त संदेश
पोल खोल न्यूज़ । शिमला

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी सूचना देने वाले व्यक्ति के साथ मारपीट करता है या उसे अवैध रूप से हिरासत में रखता है, तो इसे उसके आधिकारिक कर्तव्यों का हिस्सा नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में आरोपी पुलिसकर्मी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत सरकार से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने आरोपी पुलिस अधिकारी को मिली डिस्चार्ज राहत को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट को मामले में आगे बढ़ने के निर्देश दिए हैं।

क्या था मामला?
यह मामला मार्च 2016 का है, जब नितेश गुप्ता नामक व्यक्ति ने सड़क पर एक व्यक्ति की पिटाई होते देख पुलिस को सूचना दी। आरोप है कि तत्कालीन थाना प्रभारी बालूगंज, वीरी सिंह ने मदद करने के बजाय नितेश को थाने बुलाकर प्रताड़ित किया। शिकायत के अनुसार, उन्हें रातभर थाने में रखा गया, मारपीट की गई, मोबाइल छीन लिया गया और उनकी पत्नी के साथ भी दुर्व्यवहार हुआ। यहां तक कि पुलिस ने उनके खिलाफ झूठी सूचना देने का मामला भी दर्ज कर दिया।

मामले की जांच पुलिस महानिदेशक स्तर पर कराई गई, जिसमें शिकायतकर्ता के आरोप सही पाए गए। मेडिकल रिपोर्ट में भी चोटों की पुष्टि हुई और गवाहों के सामने मारपीट की बात सामने आई।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा कि सरकारी कर्तव्य के नाम पर अपराध को छिपाया नहीं जा सकता। सीआरपीसी की धारा 197 का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को अनावश्यक परेशानियों से बचाना है, न कि उन्हें आपराधिक कृत्यों की छूट देना।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी निर्दोष नागरिक को पीटना या अवैध रूप से हिरासत में रखना किसी भी स्थिति में पुलिस ड्यूटी का हिस्सा नहीं हो सकता। इसलिए इस मामले में अभियोजन चलाने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

यह फैसला पुलिस जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

Author: Polkhol News Himachal








