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Exclusive : हमीरपुर के ठाणा दरोगण की रामलीला में पुरुषों के अहम रोल निभा रही लड़कियां, महिला सशक्तिकरण की बन रही मिसाल

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Exclusive : हमीरपुर के ठाणा दरोगण की रामलीला में पुरुषों के अहम रोल निभा रही लड़कियां, महिला सशक्तिकरण की बन रही मिसाल

रजनीश शर्मा। हमीरपुर

भारत की परंपरागत रामलीला सदियों से धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रही है। पहले जहां इसमें सभी भूमिकाएं पुरुष कलाकारों द्वारा निभाई जाती थीं — चाहे सीता का किरदार हो या मंथरा का या फिर सूर्पनखा का — अब समय बदल चुका है।आज कई स्थानों पर युवतियां राम, लक्ष्मण, हनुमान जैसे पुरुष पात्रों की भूमिका बखूबी निभा रही हैं। ऐसी ही एक रामलीला का मंचन आजकल हमीरपुर जिला के बमसन क्षेत्र के ठाणा दारोगण गांव में हो रहा है जहां आराध्य, श्रेया, दीपांशी और रिया रामलीला में प्रमुख भूमिकाओं में मंच पर आ अपने अभिनय से दर्शकों को तालियां बजाने के लिए मजबूर कर रही हैं। खास बात यह है कि ये चारों लड़कियां अभी स्टूडेंट्स हैं तथा आगे भी राम लक्ष्मण जैसे प्रमुख किरदारों का मंचन रामलीला में करने को आत्मविश्वास से लबरेज दिख रहीं हैं। राम लीला का निर्देशन काकू और बॉबी द्वारा किया जा रहा है। इसमें रसीला राम सहित सभी ग्रामीणों का सहयोग मिल रहा है।

परिवर्तन की कहानी

हिमाचल प्रदेश के सबसे साक्षर जिला हमीरपुर के ठाणा दारोगण में अब लड़कियां मंच पर पुरुष पात्र निभा रही हैं। इसका कारण केवल कलाकारों की कमी नहीं है, बल्कि यह लैंगिक समानता और आत्मविश्वास का प्रतीक बन चुका है। जब लड़कियां आसमान छू सकती हैं तो रामलीला में राम लक्ष्मण जैसे अहम रोल क्यों नहीं निभा सकती । बस ग्रामीणों की इसी पॉजिटिव सोच ने परिवर्तन की यह कहानी लिख दी।

क्या कहती हैं ये युवतियां

श्रीराम का किरदार निभा रही आराध्य 8 वीं कक्षा की स्टूडेंट है। आराध्य के मुताबिक हमें बचपन से रामायण बहुत पसंद थी। जब मौका मिला तो सोचा कि क्यों न राम बनकर लोगों को संदेश दिया जाए।

लक्ष्मण की भूमिका में नजर आ रही श्रेया सेकण्ड ईयर की छात्रा है । श्रेया ने बताया कि लोगों को शुरू में अजीब लगा, लेकिन अब तालियां बजती हैं। मंच पर किरदार ही बोलता है, लड़कियां आज आत्मविशास से भरी हुई हैं तो रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका मिलना सौभाग्य ही समझती हूँ।

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वहीं , सीता की भूमिका निभा रही दीपांशी दस जमा दो की छात्रा है। दीपांशी ने बताया कि पहले सीता का रोल पुरुष कलाकार ही निभाते थे। उन्हें ग्रामीणों ने प्रेरित किया तो आज उनकी भूमिका को सराहा जा रहा है।

समाज की प्रतिक्रिया

इस बारे में ठाणा दारोगण गांव के ग्रामीण रसीला राम ने बताया कि कुछ पारंपरिक लोग इसे अस्वीकार करते थे, पर अब यह गौरव और प्रेरणा का विषय बन गया है। दर्शक भी मानने लगे हैं कि कला का कोई लिंग नहीं होता।

महिलाओं के सशक्तिकरण की मिसाल

इस बारे रामलीला के निर्देशक काकू एवं बॉबी ने बताया कि रामलीला अब केवल धार्मिक मंचन नहीं रही — यह महिलाओं के सशक्तिकरण की मिसाल बन रही है। युवतियां जब राम या लक्ष्मण का रूप धारण करती हैं, तो वे सिर्फ किरदार नहीं निभातीं, बल्कि एक संदेश देती हैं कि साहस और भक्ति किसी एक पुरुष की संपत्ति नहीं। उन्होंने बताया कि गत 9 वर्षों से रामलीला का सफल मंचन हो रहा है लेकिन लड़कियां पहली बार पुरुष किरदार में नजर आ रही है।

 

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