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हिमाचल हाईकोर्ट का अहम फैसला—लिव-इन जैसी स्थिति में भी महिला को मिलेगी पारिवारिक पेंशन

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हिमाचल हाईकोर्ट का अहम फैसला—लिव-इन जैसी स्थिति में भी महिला को मिलेगी पारिवारिक पेंशन

पोल खोल न्यूज़ । शिमला

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो भले ही उनका विवाह कानूनी रूप से वैध न हो, उसे अनैतिक नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में आर्थिक रूप से निर्भर महिला को बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता और वह अपने दिवंगत साथी की पारिवारिक पेंशन की हकदार हो सकती है।

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने 3 अप्रैल 2025 के एकल पीठ के फैसले को रद्द करते हुए अपीलकर्ता के पक्ष में निर्णय सुनाया। अदालत ने आदेश दिया कि महिला को पति की मृत्यु के बाद से बकाया सहित पारिवारिक पेंशन प्रदान की जाए।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हाशिये पर रहने वाली महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। केवल तकनीकी आधार पर उन्हें पेंशन से वंचित करना अन्याय होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(i) के तहत दूसरा विवाह भले अवैध हो, लेकिन इसे सामाजिक रूप से अनैतिक नहीं माना जा सकता। जिस प्रकार ऐसे संबंधों में महिला को भरण-पोषण (मेंटेनेंस) का अधिकार मिलता है, उसी तरह पेंशन भी आर्थिक सुरक्षा का माध्यम है।

क्या था मामला?

अदालत के अनुसार अपीलकर्ता और एक सेवानिवृत्त फोरमैन वर्ष 1994 से 2006 तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत, लंबे समय तक साथ रहना वैध विवाह की धारणा को जन्म देता है, जब तक इसके विपरीत ठोस सबूत न हों।

मृतक कर्मचारी ने अपने जीवनकाल में अपीलकर्ता का नाम सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया था, जिसे बाद में विवाद के चलते हटाने का प्रयास किया गया। साथ ही, कर्मचारी की पहली पत्नी का पहले ही निधन हो चुका था और उसके बच्चों ने भी पेंशन पर कोई दावा नहीं किया।

इस फैसले को सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो यह सुनिश्चित करता है कि वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज कर केवल कानूनी तकनीकीताओं के आधार पर किसी को अधिकारों से वंचित न किया जाए।

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