
हिमाचल में किशोरों में बढ़ता मानसिक तनाव, 53% बच्चे प्रभावित
पोल खोल न्यूज़ डेस्क । शिमला

हिमाचल प्रदेश में किशोर अवस्था के बच्चों में मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) और पीजीआई चंडीगढ़ के डॉक्टरों द्वारा किए गए एक अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। करीब 11,000 किशोरों पर किए गए सर्वे में पाया गया कि 53 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी प्रकार के मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं।

अध्ययन के अनुसार लगभग 14 प्रतिशत किशोर अवसाद से प्रभावित हैं, जबकि इतने ही प्रतिशत अन्य मानसिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि करीब 5 प्रतिशत किशोरों में आत्महत्या के विचार भी पाए गए हैं। 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग के किशोर सबसे अधिक प्रभावित हैं। हालांकि, वर्ष 2023 में आत्महत्या के विचारों से जुड़े मामलों में कुछ कमी दर्ज की गई, जिसे विशेषज्ञ जागरूकता का सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।

मानसिक तनाव के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार किशोरों में बढ़ते तनाव के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। इनमें पढ़ाई का दबाव, करियर को लेकर असमंजस, मोबाइल और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग, नींद की कमी और अभिभावकों व समाज की बढ़ती अपेक्षाएं शामिल हैं। कोविड-19 महामारी के बाद की परिस्थितियों—जैसे लंबे समय तक सामाजिक अलगाव और ऑनलाइन पढ़ाई—ने भी इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।

103 ‘नई दिशा’ केंद्र दे रहे सहारा
किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिए प्रदेश में 103 ‘नई दिशा’ केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों में काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, नशा मुक्ति सेवाएं और टेली-मानस के जरिए ऑनलाइन परामर्श की सुविधा उपलब्ध है। प्रशिक्षित डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ बच्चों और उनके अभिभावकों को उचित मार्गदर्शन दे रहे हैं। गंभीर मामलों में अस्पतालों में रेफर भी किया जाता है।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डॉ. अंजलि चौहान के अनुसार इन केंद्रों के चलते किशोरों में मदद लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिससे समस्याओं की पहचान और रिपोर्टिंग बेहतर हुई है। वहीं स्वास्थ्य सचिव एम. सुधा ने कहा कि ‘नई दिशा’ केंद्र किशोरों के लिए मजबूत सहारा बनकर उभरे हैं।

जमीनी स्तर पर दिख रहे असर (केस स्टडी)
घणाहट्टी की मीरा देवी के अनुसार उनका 14 वर्षीय बेटा मोबाइल का अत्यधिक उपयोग करता है, जिससे उसमें चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ गया है।

रोहड़ू से आए प्रेमलाल ने बताया कि दसवीं के बाद उनके बेटे के व्यवहार में बदलाव आया, जिसके बाद उसे इलाज और काउंसलिंग के लिए अस्पताल भेजा गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान, खुलकर संवाद और पेशेवर मदद से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
Author: Polkhol News Himachal








