
अब हमीरपुर चंडीगढ़ वाया ऊना 21 किलोमीटर का लगेगा शॉर्ट कट, लठियाणी-बिहडू 860 मीटर लंबे पुल का काम शुरू
रजनीश शर्मा। हमीरपुर
गोबिंद सागर पर अब उत्तर भारत का सबसे लंबा पुल: लठियाणी-बिहडू के बीच 860 मीटर केबल-स्टेड वायडक्ट प्रोजेक्ट का काम शुरू हो गया है। पुल बनने से हमीरपुर चंडीगढ़ वाया ऊना नंगल की दूरी 21 किलोमीटर कम हो जाएगी। इसका लाभ हमीरपुर जिला की करीब डेढ़ लाख तथा ऊना जिला की करीब एक लाख की आबादी को प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से मिलेगा। पीरनिगाह (ऊना) से हर साल लाखों श्रद्धालुओं को भी इसका लाभ मिलेगा जो बाबा बालक नाथ की नगरी शाहतालाई एवं दियोट सिद्ध माथा टेकने आते हैं।
मुख्य जानकारी (इन्फो बॉक्स)
परियोजना स्थान: गोबिंद सागर झील, लठियाणी से बिहडू तक (ऊना जिला, हिमाचल प्रदेश)
लंबाई: 860 मीटर (केबल-स्टेड + वायडक्ट)
अनुमानित लागत: ₹897 करोड़ (प्रस्तावित)
संभावित दूरी कटौती: हमीरपुर-ऊना वाया बड़सर — 80 किमी से घटकर ~59 किमी
निर्माण अवधि: लगभग 30 महीने में पूरा होगा
पर्यावरण प्रभाव: करीब 4068 पेड़ कटेंगे
प्रभावित इलाक़े: 14 गांवों को बेहतर सड़क कनेक्टिविटी
निर्माण एजेंसी: परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा निविदा प्रक्रिया पूरी

परियोजना विवरण — पैराग्राफ वाइज
प्रोजेक्ट की पूरी तस्वीर
गोबिंद सागर झील पर लठियाणी से बिहडू के बीच प्रस्तावित 860 मीटर केबल-स्टेड और वायडक्ट पुल का निर्माण शुरू होने जा रहा है। इसका उद्देश्य मोटरबोट पर निर्भरता और लंबा सड़क चक्कर खत्म करना है। निर्माण के पूरा होने पर यह उत्तर भारत का सबसे लंबा पुल बनकर तैयार होगा, जो तकनीकी और इंजीनियरिंग की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।
कब शुरू और क्यों देरी हुई?
इस परियोजना को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की मंजूरी फरवरी 2025 में मिली थी, जिसके बाद ही जमीन से जुड़ी औपचारिकताएं, टेंडरिंग और पेड़ कटने की मंजूरी जैसे आवश्यक काम शुरू किए गए। इससे पहले कई महीनों तक पर्यावरण मंजूरी न मिलने की वजह से जमीन स्तर पर कार्य शुरू नहीं हो पाया, जिससे इस बड़े पुल के निर्माण में अपेक्षित गति नहीं आ सकी।
हमीरपुर-ऊना-चंडीगढ़-नंगल मार्ग पर असर
पुल बनने से हमीरपुर और ऊना के बीच दूरी लगभग 21 किमी घटेगी। यही नहीं, यह प्रोजेक्ट चंडीगढ़-नंगल सहित आस-पास के बड़े ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को भी नई कनेक्टिविटी देगा, जिससे लोगों का रोज़ाना आवागमन तेज़, सस्ता और सुरक्षित होगा। विद्यार्थी, मरीज और रोज़गार हेतु आने-जाने वालों को भारी राहत मिलेगी।
पर्यावरणीय चिंताएँ और लाभ-हानि
पुल के दोनों किनारों पर कुल 4068 पेड़ काटने की आवश्यकता है, जिसमें 380 वन भूमि के पेड़ हैं। स्थानीय समुदाय और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि वन भूमि और पेड़ों की संख्या को संतुलित रखते हुए परियोजना को और अधिक हरित तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
स्थानीय उम्मीदें और आलोचनाएँ
14 गांवों के निवासियों को उम्मीद है कि पुल बन जाने पर ऊना, हमीरपुर और आसपास के बाजारों, कॉलेजों, अस्पतालों तक पहुँच और आसान होगी। वहीं कुछ पंचायतें पुल मार्ग में स्थान-अनुसार छूटने के कारण शामिल नहीं होती दिख रही हैं, जिससे उन्हें भी जोड़ने की मांग उठ रही है।
गोबिंद सागर का यह पुल न केवल एक बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट है, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक तस्वीर बदलने वाला कदम भी माना जा रहा है। पुल के पूरा होने से यातायात के साथ-साथ पर्यटन, शिक्षा और व्यापार क्षेत्र को भी नई ऊँचाई मिलेगी। हालांकि अभी भी पर्यावरण संतुलन और ग्रामीण कनेक्टिविटी को ध्यान में रखते हुए कार्यों को पूर्ण गति से आगे बढ़ाना आवश्यक है।
Author: Polkhol News Himachal










