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हिमाचल में दुर्लभ बीमारियों के 113 केस, जागरूकता की कमी से देर से चल रहा पता

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हिमाचल में दुर्लभ बीमारियों के 113 केस, जागरूकता की कमी से देर से चल रहा पता

पोल खोल न्यूज़ डेस्क । शिमला

हिमाचल प्रदेश में दुर्लभ बीमारियों को लेकर जागरूकता का अभाव चिंता का विषय बना हुआ है। अधिकांश मरीजों को इन रोगों की जानकारी तब मिलती है, जब वे किसी अन्य बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, दुर्लभ रोग कम लोगों में पाए जाते हैं, लेकिन प्रभावित मरीजों और उनके परिवारों के लिए यह जीवनभर की गंभीर चुनौती बन जाते हैं।

चिकित्सकों का कहना है कि 70 से 80 प्रतिशत दुर्लभ बीमारियां जीन में बदलाव यानी आनुवंशिक कारणों से होती हैं। कई मामलों में इनके लक्षण जन्म के समय या कम उम्र में दिखाई देते हैं, जबकि कुछ मामलों में किशोरावस्था या युवावस्था में भी इनका पता चलता है। ये बीमारियां संक्रामक नहीं होतीं और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलतीं।

दुर्लभ रोगों में थैलेसीमिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस, हीमोफिलिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जैसी गंभीर बीमारियां शामिल हैं। भारत में हर वर्ष 28 फरवरी को दुर्लभ रोग दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को इन बीमारियों के प्रति जागरूक करना है।

प्रदेश में अब तक दुर्लभ बीमारियों के 113 मामले सामने आए हैं। इन मरीजों को अस्पताल में जांच के दौरान ही अपनी बीमारी का पता चला। जानकारी के अभाव में कई मरीज लंबे समय तक सही जांच और उपचार से वंचित रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन रोगों के लक्षण सामान्य बीमारियों जैसे हो सकते हैं, जिससे पहचान में देरी हो जाती है।

जिला अस्पतालों में जेनेटिक जांच की सुविधा सीमित होने के कारण भी समय पर निदान करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में मरीजों को मेडिकल कॉलेजों का रुख करना पड़ता है, जहां विशेषज्ञों द्वारा जांच और उपचार किया जाता है।

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दुर्लभ रोग संक्रामक नहीं, समय पर पहचान जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार दुर्लभ रोग संक्रामक नहीं होते और इनका मुख्य कारण आनुवंशिक गड़बड़ी होती है। यदि समय रहते इनकी पहचान हो जाए, तो उचित उपचार और परामर्श के माध्यम से मरीज के जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।

विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि यदि परिवार में किसी आनुवंशिक बीमारी का इतिहास है, तो नियमित चिकित्सकीय जांच करवाना जरूरी है। जागरूकता और समय पर जांच से इन बीमारियों के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज के कम्यूनिटी मेडिसन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डीएस ढडवाल ने बताया कि ये बीमारियां बहुत कम लोगों में पाई जाती हैं और लोगों को इनके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। कई बार अन्य रोगों के इलाज के लिए अस्पताल आने वाले मरीजों में जांच के दौरान इन दुर्लभ बीमारियों की पुष्टि हो जाती है।

📊 इन्फो बॉक्स:

  • प्रदेश में अब तक 113 दुर्लभ रोगों के मामले सामने आए
  • 70–80% मामले आनुवंशिक कारणों से जुड़े
  • ये रोग संक्रामक नहीं होते
  • लक्षण जन्म से या कम उम्र में दिखाई दे सकते हैं
  • जिला अस्पतालों में जेनेटिक जांच सुविधा सीमित
  • जागरूकता की कमी से पहचान में देरी
  • 28 फरवरी को मनाया जाता है दुर्लभ रोग दिवस

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