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रंग, रस और राग का उत्सव : सुजानपुर टीहरा की ऐतिहासिक होली

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रंगों में रची विरासत, सुरों में बसती संस्कृति

सुजानपुर टीहरा की ऐतिहासिक होली—जहाँ इतिहास भी मनाता है उत्सव

लेखक: राजन कुमार शर्मा
स्थान: डुगली, लंबलू, जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश

जब बसंत रंगों से नहीं, विरासत से खिलता है

हिमाचल प्रदेश की वादियों में बसंत केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं देता, बल्कि वह अपने साथ लेकर आता है परंपरा, उल्लास और सांस्कृतिक चेतना का नवप्रवाह। इन्हीं जीवंत परंपराओं का सबसे भव्य और ऐतिहासिक स्वरूप है सुजानपुर टीहरा की होली—एक ऐसा उत्सव, जहाँ रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि इतिहास और आत्मा पर भी चढ़ते हैं।

हिमालय की गोद में बसे इस ऐतिहासिक नगर में जैसे ही होली का आगमन होता है, पूरा वातावरण ढोल-नगाड़ों की गूँज, लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियों और उल्लास से भर उठता है। यहाँ का प्रत्येक चौक, प्रत्येक मंदिर और प्रत्येक प्राचीन दीवार मानो अपनी स्मृतियों से जागकर इस उत्सव का हिस्सा बन जाती है।

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राजसी संरक्षण से जनउत्सव तक का गौरवशाली सफर

सुजानपुर टीहरा की होली केवल लोकउत्सव नहीं, बल्कि राजसी परंपरा की जीवित धरोहर है। कटोच वंश के संरक्षण में आरंभ हुआ यह उत्सव उस युग की याद दिलाता है, जब संस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग हुआ करती थी।

राजदरबारों से प्रारंभ होकर यह होली समय के साथ जनमानस में इस प्रकार समाहित हुई कि आज यह लोक और राजसी परंपरा का अद्वितीय संगम बन चुकी है।

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जब पूरा नगर बन जाता है संस्कृति का रंगमंच

होली के अवसर पर सुजानपुर टीहरा का प्रत्येक कोना सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का मंच बन जाता है।

ढोल की थाप पर थिरकते कदम, लोकगीतों की मधुर गूँज और पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकार—यह दृश्य केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवंत लोकसंस्कृति का साक्षात दर्शन होता है।
यहाँ रंगों का महत्व केवल बाहरी नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक है—जो लोगों के दिलों को जोड़ता है और समाज को एकता के सूत्र में पिरोता है।

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एकता, समरसता और सांस्कृतिक संवाद का पर्व

सुजानपुर टीहरा की होली सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है। इस दिन सभी सामाजिक भेदभाव समाप्त हो जाते हैं और हर व्यक्ति एक ही रंग में रंगा दिखाई देता है।

यह उत्सव केवल आनंद का अवसर नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद का माध्यम भी है। यहाँ वरिष्ठ पीढ़ी अपनी परंपराओं को युवा पीढ़ी तक पहुँचाती है, जिससे सांस्कृतिक विरासत निरंतर जीवित रहती है।

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सीमाओं से परे, पहचान बन चुका है यह उत्सव

आज सुजानपुर टीहरा की होली केवल स्थानीय उत्सव नहीं रही, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुकी है। हर वर्ष दूर-दूर से आने वाले पर्यटक इस उत्सव की गरिमा और सांस्कृतिक ऊर्जा का अनुभव करने यहाँ पहुँचते हैं।

यह उत्सव न केवल संस्कृति को जीवित रखता है, बल्कि क्षेत्र की पहचान, पर्यटन और सामाजिक जीवन को भी नई ऊर्जा प्रदान करता है।

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विरासत का रंग, संस्कृति का उत्सव

सुजानपुर टीहरा की होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक अनुभूति है—एक ऐसा अनुभव, जहाँ इतिहास वर्तमान से मिलता है, जहाँ परंपरा आधुनिकता से संवाद करती है, और जहाँ संस्कृति अपने सबसे सुंदर रूप में जीवित दिखाई देती है।

यह उत्सव हमें यह स्मरण कराता है कि हमारी परंपराएँ केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला हैं।

सुजानपुर टीहरा की होली—हिमाचल की आत्मा का वह रंग है, जो समय के साथ और भी गहरा होता जा रहा है।

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