
हिमाचल: सूखे दो तिहाई पारंपरिक झरने, गांवों में घट रही आबादी, रिपोर्ट में खुलासा
पोल खोल न्यूज़ | शिमला
हिमाचल प्रदेश में चार साल में मानसून सीजन में 1700 लोगों की जान चली गई, जबकि 46,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। हिमाचल प्रदेश मानव विकास रिपोर्ट 2025 में यह खुलासा हुआ है। इस रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में जल संकट गहरा रहा है। दो-तिहाई पारंपरिक झरने सूख रहे हैं, जिससे कुछ गांवों की आबादी कम हो रही है। जंगल में आग आग की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। 2024-2025 में 2,580 घटनाएं दर्ज की गई, जबकि 2022 2023 में 856 घटनाएं हुईं। जलवायु प्रभाव मौजूदा असमानताओं को बढ़ाकर और उन क्षेत्रों को खतरे में डालकर जोखिम बढ़ाने का काम कर रहा है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए वर्तमान और भविष्य में महत्वपूर्ण है। हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में निर्माण और पर्यटन सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में शामिल हैं।

बता दें कि 2023-2024 में निर्माण क्षेत्र में रोजगार का 11.5 प्रतिशत हिस्सा रहा, जबकि पर्यटन ने जीएसडीपी में 7.8 प्रतिशत का योगदान दिया। कुल रोजगार में 14 प्रतिशत से अधिक का योगदान दिया। वर्ष 2024 में 2023 की तुलना में पर्यटकों के आने की संख्या में 13 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों क्षेत्रों में महिलाओं, प्रवासियों और अनौपचारिक श्रमिकों के लिए आजीविका का सृजन किया। पर्यटन क्षेत्र बर्फबारी में कमी और मौसम की घटनाओं के कारण बढ़ते जोखिमों का सामना कर रहा है, जिससे पर्यटकों की संख्या कम हो रही है। इससे आतिथ्य सत्कार पर निर्भर आजीविका को खतरा है। 2025 के मानसून के मौसम में सार्वजनिक और निजी संपत्ति के संचयी नुकसान से राज्य को 24,800 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ।
वहीं, रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल की अर्थव्यवस्था कृषि से दूर जा रही है। यह क्षेत्र राज्य के कुल कार्यबल के 54 प्रतिशत को रोजगार देता है। लेकिन यह सकल मूल्य वृद्धि (जीवीए) में केवल 14 प्रतिशत योगदान देती है, जिससे राज्य की आय में इसका हिस्सा उद्योग और सेवाओं से कम हो जाता है। उद्योग कुल कार्यबल का 22 प्रतिशत एवं सेवाएं 24 प्रतिशत को रोजगार देते हैं, लेकिन राज्य के जीवीए में इनका हिस्सा बहुत अधिक है। यह क्रमवार 40 और 45 प्रतिशत हैं। विनिर्माण क्षेत्र, फार्मास्यूटिकल्स, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) का राज्य के जीवीए में लगभग 27 प्रतिशत है। पर्यटन का योगदान 7.8 प्रतिशत है। यह क्षेत्र राज्य के कुल कार्यबल के 54 प्रतिशत को रोजगार देता है। लेकिन जीवीए में केवल 14 प्रतिशत योगदान देती है। जलवायु परिवर्तन से डेंगू, डायरिया टाइफाइड और अन्य रोगों के मामले बढ़ रहे है।
मानव विकास सूचकांक के दृष्टिगत जलवायु के अनुसार खुद को समायोजित (एडजस्ट) करने में किन्नौर अव्वल रहा है। दूसरे नंबर पर लाहौल स्पीति, तीसरे पर चंबा, चौथे पर कांगड़ा, पांचवें पर सिरमौर, छठे पर मंडी, सातवें पर कुल्लू, आठवें पर शिमला, नौवें पर हमीरपुर, दसवें पर ऊना, 11वें पर सोलन और 12वें पर बिलासपुर रहा है। विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने मुख्यमंत्री सुक्खू के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए हिमाचल प्रदेश के जलवायु-संवेदनशील विकास मॉडल को एक प्रेरक उदाहरण बताया है।


Author: Polkhol News Himachal









