

संपादकीय: गणतंत्र का वास्तविक अर्थ और महत्व
.…..रजनीश शर्मा ( हमीरपुर )
आज का सवाल: क्या हम गणतंत्र को केवल एक उत्सव के रूप में मना रहे हैं, या उसे अपने विचार, व्यवहार और जिम्मेदारियों में भी सचमुच जी रहे हैं?

हर वर्ष 26 जनवरी को देश गणतंत्र दिवस मनाता है। राजपथ की भव्य परेड, झांकियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस दिन को विशेष बनाते हैं, लेकिन इन सबके बीच एक सवाल अक्सर अनुत्तरित रह जाता है—क्या हम गणतंत्र के वास्तविक अर्थ को समझ पा रहे हैं? क्या गणतंत्र हमारे जीवन और सोच का हिस्सा बन पाया है, या यह केवल एक औपचारिक उत्सव बनकर रह गया है?

गणतंत्र का शाब्दिक अर्थ है—जनता का शासन। गण यानी जनता और तंत्र यानी व्यवस्था। यह अवधारणा स्पष्ट करती है कि देश की सर्वोच्च शक्ति किसी राजा, वंश या व्यक्ति में नहीं, बल्कि जनता में निहित होती है। भारत ने 26 जनवरी 1950 को संविधान को अपनाकर इसी सिद्धांत को औपचारिक रूप दिया। यही वह क्षण था, जब भारत केवल स्वतंत्र राष्ट्र ही नहीं, बल्कि एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बना।
गणतंत्र की आत्मा संविधान में बसती है। संविधान न केवल शासन की रूपरेखा तय करता है, बल्कि नागरिकों को अधिकार और सुरक्षा भी प्रदान करता है। समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व—ये केवल शब्द नहीं, बल्कि गणतंत्र के चार मजबूत स्तंभ हैं। इनका उद्देश्य एक ऐसे समाज की स्थापना करना है, जहां व्यक्ति की पहचान उसकी जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके नागरिक होने से तय हो।

आज के समय में गणतंत्र की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। जब सत्ता के केंद्रीकरण, असहिष्णुता और अविश्वास जैसी चुनौतियां सामने हों, तब गणतंत्र हमें याद दिलाता है कि कोई भी सत्ता संविधान से ऊपर नहीं है। चुनी हुई सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह हैं और नागरिकों का यह अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है कि वे सवाल पूछें, सच को पहचानें और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करें।
हालांकि, गणतंत्र केवल अधिकारों की सूची नहीं है। यह कर्तव्यों की भी उतनी ही स्पष्ट मांग करता है। मतदान में भागीदारी, कानून का सम्मान, सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा—ये सभी एक जिम्मेदार नागरिक के दायित्व हैं। यदि नागरिक सजग नहीं होंगे, तो सबसे मजबूत संविधान भी कमजोर पड़ सकता है।
भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में गणतंत्र एक साझा सूत्र का काम करता है। यह हमें क्षेत्र, भाषा और संस्कृति की भिन्नताओं के बावजूद एक राष्ट्र के रूप में जोड़ता है। यही बंधुत्व की भावना देश की सबसे बड़ी ताकत है, जिसे बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

गणतंत्र दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन भी है। यह सोचने का समय है कि क्या हम अपने संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप आचरण कर रहे हैं। सच्चा गणतंत्र वही है, जहां जागरूक नागरिक, पारदर्शी शासन और स्वतंत्र संस्थाएं मिलकर राष्ट्र को आगे बढ़ाएं।

इस गणतंत्र दिवस पर संकल्प यही होना चाहिए कि हम संविधान को केवल सम्मान न दें, बल्कि उसे अपने व्यवहार और निर्णयों में भी उतारें। क्योंकि जब तक गणतंत्र जन-जन की चेतना में जीवित रहेगा, तभी भारत का लोकतंत्र वास्तव में मजबूत कहलाएगा।
गणतंत्र की असली परीक्षा परेडों में नहीं, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के आचरण, सवाल पूछने के साहस और संविधान के प्रति निष्ठा में होती है।



Author: Polkhol News Himachal









