

डंके की चोट पर : निमंत्रण से सियासी संदेश तक: धूमल–राणा राजनीति का पूरा परिदृश्य
रजनीश शर्मा। हमीरपुर
सर्व कल्याणकारी ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक राणा ने 15 जनवरी को सुजानपुर में आयोजित सेना दिवस समारोह में शामिल होने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को उनके समीरपुर निवास पर जाकर व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किया था। पूर्व सीएम ने यह निमंत्रण सहर्ष स्वीकार भी किया, लेकिन कार्यक्रम के दिन वे समारोह में शामिल नहीं हो सके।
स्वास्थ्य कारण या राजनीतिक कयास
प्रोफेसर धूमल की अनुपस्थिति को लेकर प्रमुख कारण उनके स्वास्थ्य में अचानक आए उतार-चढ़ाव को बताया गया। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर यह तर्क उछाला गया कि यदि वे जमली धाम में एक संस्था के कार्यक्रम में जा सकते थे, तो सुजानपुर क्यों नहीं पहुंचे। हालांकि, इन दोनों आयोजनों की परिस्थितियां अलग थीं और तथ्यों को जाने बिना लगाए गए आरोपों का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं था।

सोशल मीडिया की अफवाहें और हकीकत
बिना पुख्ता जानकारी के सोशल मीडिया पर यह नैरेटिव खड़ा किया गया कि धूमल परिवार और राणा परिवार के बीच नई खटास पैदा हो गई है। जबकि सच्चाई यह है कि इन रिश्तों में उतार-चढ़ाव कोई नया घटनाक्रम नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा है।
राणा–धूमल रिश्तों की पृष्ठभूमि
राजेंद्र राणा और धूमल परिवार के बीच संबंधों में आई दूरी के पीछे कई चुनावी लड़ाइयां रही हैं। एक दौर ऐसा भी था जब कई नेता राजेंद्र राणा के इर्द-गिर्द नजर आते थे, लेकिन समय और सत्ता के समीकरण बदलते ही वही लोग रिश्तों में दरार डालने की भूमिका में दिखे।
अनुराग ठाकुर से मुकाबला
यह भी निर्विवाद तथ्य है कि राजेंद्र राणा ने चुनावी राजनीति में न केवल प्रोफेसर धूमल बल्कि उनके पुत्र अनुराग ठाकुर के खिलाफ भी सीधा मुकाबला किया। 2014 के लोकसभा चुनाव में अनुराग ठाकुर के खिलाफ चुनाव लड़कर राणा को हार का सामना करना पड़ा, जिससे दोनों खेमों के बीच दूरी और बढ़ गई।
2017: बदले की राजनीति
2017 के विधानसभा चुनाव में राजेंद्र राणा ने राजनीतिक बदला लेते हुए प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल को पराजित कर दिया। इस जीत ने हिमाचल की राजनीति में बड़ा संदेश दिया कि सियासी जंग में पुराने समीकरण कभी भी पलट सकते हैं।

2024 उपचुनाव और पुराने जख्म
राजनीतिक समझदारी यही कहती है कि हार–जीत के बाद रिश्तों में संतुलन आ जाना चाहिए था, लेकिन 2024 के सुजानपुर उपचुनाव ने पुराने जख्मों को फिर हरा कर दिया। कांग्रेस प्रत्याशी कैप्टन रणजीत सिंह राणा के हाथों भाजपा की अप्रत्याशित हार ने खटास को और गहरा कर दिया।
लोकसभा बनाम उपचुनाव: विरोधाभासी नतीजे
एक ओर लोकसभा चुनाव में सुजानपुर क्षेत्र से भाजपा को करीब 23 हजार वोटों की बढ़त मिलती है, वहीं दूसरी ओर उसी क्षेत्र में उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी लगभग 2300 वोटों से हार जाता है। यह विरोधाभास राजनीतिक रणनीति और अंदरूनी समीकरणों पर सवाल खड़े करता है।
राजनीति का कटु सत्य
कुल मिलाकर, हिमाचल की राजनीति यह साफ संकेत देती है कि राजनीतिक युद्ध में कोई किसी का स्थायी नहीं होता। आज का सहयोगी कल का प्रतिद्वंद्वी बन सकता है और आज की दूरी भविष्य में नई सियासी साझेदारी में भी बदल सकती है।
इन्फो बॉक्स | धूमल–राणा राजनीतिक टकराव की टाइमलाइन
- 2012: भाजपा के समर्थन से राजेंद्र राणा ने दो दिग्गज नेत्रियों को निर्दलीय हराया।
- 2014: लोकसभा चुनाव में अनुराग ठाकुर के खिलाफ राजेंद्र राणा को हार।
- 2017: विधानसभा चुनाव में राजेंद्र राणा ने प्रेम कुमार धूमल को पराजित किया।
- 2022: राजेंद्र राणा ने प्रेम कुमार धूमल के नजदीकी रहे कैप्टन रणजीत सिंह राणा को चंद वोटों के अंतर से हरा दिया
- 2024 (लोकसभा): सुजानपुर से भाजपा को लगभग 23 हजार वोटों की बढ़त।
- 2024 (उपचुनाव): सुजानपुर में भाजपा प्रत्याशी करीब 2300 वोटों से हारे।
निष्कर्ष:
अब निगाहें 2026 और 2027 पर टिकी हैं, जहां यह सियासी संघर्ष फिर नए रंग और नए समीकरणों के साथ सामने आ सकता है।
Author: Polkhol News Himachal









