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“प्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भरता की मिसाल बने ललित कालिया — देसी बीजों के संरक्षण से रच रहे हरित भविष्य”

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“प्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भरता की मिसाल बने ललित कालिया — देसी बीजों के संरक्षण से रच रहे हरित भविष्य”

रजनीश शर्मा। हमीरपुर 

हिमाचल प्रदेश को प्राकृतिक खेती का आदर्श राज्य बनाने की दिशा में सरकार के प्रयास ज़मीन पर साकार होते दिख रहे हैं। जिला हमीरपुर के बमसन ब्लॉक अंतर्गत गांव हरनेड़ के प्रगतिशील किसान ललित कालिया ने प्राकृतिक खेती अपनाकर न सिर्फ रासायनिक खेती से दूरी बनाई, बल्कि प्राचीन देसी बीजों के संरक्षण और वितरण में भी एक अनुकरणीय मॉडल खड़ा किया है।

कृषि विभाग और आत्मा परियोजना के मार्गदर्शन में ललित कालिया पूरी तरह प्राकृतिक विधियों से खेती कर रहे हैं। उनके पास गेहूं की आठ देसी किस्में, मक्की व जौ की पारंपरिक किस्में तथा मंढल, कोदरा, कौंगणी और बाजरा जैसे लुप्तप्राय मोटे अनाजों के बीज सुरक्षित हैं—जो कम वर्षा में भी बेहतर पैदावार देते हैं और पोषण से भरपूर हैं।

रासायनिक खाद व जहरीले कीटनाशकों के दुष्प्रभावों को देखते हुए उन्होंने कुछ वर्ष पूर्व प्राकृतिक खेती अपनाई। हिमआर्या नेटवर्क से जुड़ने के बाद उनके मन में देसी बीजों के संरक्षण का विचार और सशक्त हुआ। आज उनके घर में गेहूं, मक्की के साथ-साथ दलहनी, तिलहनी फसलें और सब्जियों के प्राचीन बीजों का सुव्यवस्थित “बीज बैंक” तैयार है।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू के प्रयासों की सराहना करते हुए ललित कालिया बताते हैं कि प्राकृतिक उपज के लिए अलग से उच्च खरीद मूल्य का प्रावधान किसानों के लिए बड़ी सौगात है। पिछले सीजन में उन्होंने प्राकृतिक विधि से तैयार एक क्विंटल से अधिक मक्की बेची, जबकि इस सीजन में पारिवारिक आवश्यकता के बाद एक क्विंटल से अधिक गेहूं बेचकर अच्छी आय अर्जित की।

उनका मानना है कि सरकार के इन कदमों से आने वाले समय में बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर अग्रसर होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, देसी बीजों का उपयोग प्रतिकूल मौसम में भी स्थिर उत्पादन देता है और पोषण गुणवत्ता को बढ़ाता है—जो सतत कृषि का मजबूत आधार है।


🟩 इन्फो बॉक्स | एक नज़र में

  • किसान: ललित कालिया
  • स्थान: गांव हरनेड़, बमसन ब्लॉक, जिला हमीरपुर
  • खेती पद्धति: पूर्ण प्राकृतिक खेती
  • देसी बीज संग्रह:
    • गेहूं (8 किस्में), मक्की, जौ
    • मोटे अनाज: मंढल, कोदरा, कौंगणी, बाजरा

  • उपलब्धियां:
    • देसी बीज बैंक का निर्माण
    • प्राकृतिक उपज की बिक्री से बेहतर आय
  • सरकारी सहयोग: कृषि विभाग, आत्मा परियोजना, हिमआर्या नेटवर्क
  • विशेष लाभ: कम वर्षा में भी अच्छी पैदावार, उच्च पोषण, बेहतर खरीद मूल्य

ललित कालिया की पहल यह साबित करती है कि प्राकृतिक खेती और देसी बीज संरक्षण से किसान आत्मनिर्भर बन सकते हैं—और हिमाचल की खेती को टिकाऊ भविष्य मिल सकता है।

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