best news portal development company in india

समीक्षा : हिमाचल की राजनीति में भाजपा के अंदर की खेमेबाजी कहीं सस्ते में कांग्रेस को 2027 में सत्ता में फिर से रीपीट न करवा दे

SHARE:

समीक्षा : हिमाचल की राजनीति में भाजपा के अंदर की खेमेबाजी कहीं सस्ते में कांग्रेस को 2027 में सत्ता में फिर से रीपीट न करवा दे

रजनीश शर्मा । हमीरपुर

हिमाचल प्रदेश, जिसे देश की “शांत राजनीति” के लिए जाना जाता है, अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर गहराते गुटबाज़ी के दौर से गुजर रहा है। सत्ता से बाहर आने के बाद भाजपा में नेतृत्व और रणनीति को लेकर भीतरखाने मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। संगठन और विधायकों के बीच बढ़ती दूरी ने पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं कांग्रेस से बीजेपी में आए विधायकों तथा 2024 के 9 उपचुनावों के बाद भाजपा के अंदर खेमेबाजी ने जड़ें और मजबूत की हैं। हाल ही में हुए भाजपा के 9 मोर्चों में पदाधिकारियों की तैनाती के बाद भी पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी के आरोप भाजपा के अंदर लगे हैं। सत्ता में बेशक इस वक्त कांग्रेस है लेकिन भाजपा की आपसी लड़ाई कांग्रेस को सस्ते में फिर 2027 में रीपीट करने का मौका दे सकती है।

🔴 वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य

2022 के विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद भाजपा विपक्ष में है। पार्टी का नेतृत्व बदलते समीकरणों, क्षेत्रीय गुटों और वरिष्ठ नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से जूझ रहा है। यूं तो भाजपा के अंदर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 5 गुट होने की बात कही जा रही हैं लेकिन। मुख्य रूप से भाजपा के भीतर तीन प्रमुख गुट सक्रिय बताए जा रहे हैं —

1. पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर गुट: मंडी केंद्रित यह खेमे का झुकाव पारंपरिक संगठनवाद की ओर है, जो जयराम ठाकुर को भविष्य का चेहरा बनाए रखना चाहता है। 2022 के विधानसभा चुनावों में मंडी संसदीय क्षेत्र से जयराम ठाकुर ने अपनी लोकप्रियता का शानदार प्रदर्शन भी किया था।

2. शांता कुमार समर्थक गुट: यह गुट नैतिक और वैचारिक राजनीति की पैरवी करता है, लेकिन संगठन में सक्रिय भूमिका सीमित है। भाजपा के पुराने संघ से जुड़े लोग आज भी शांता कुमार का गुणगान करते नजर आते हैं।

3. धूमल समर्थक गुट: हमीरपुर , ऊना और कांगड़ा क्षेत्र में प्रभावशाली यह खेमे का असर अभी भी कुछ वरिष्ठ नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं पर है। 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा का ऊना और हमीरपुर में प्रदर्शन ठीक न रहने का नुकसान इस गुट को कहीं न कहीं उठाना पड़ा ।

🔴 भाजपा के अंदर खेमेबाजी के कारण

भाजपा के अंदर अभी तक नेतृत्व की अस्पष्टता खेमेबाजी की प्रमुख वजह है। 2027 के चुनाव के लिए अब तक पार्टी ने स्पष्ट चेहरा तय नहीं किया। फिलहाल , अनुराग , जयराम , बिंदल , विपिन परमार जैसे नाम भाजपा के भविष्य के मुख्यमंत्रियों के रूप में सामने आ रहे हैं । इन नेताओं के नाम पर हुई नारेबाजी और उसके बाद आई प्रतिक्रियाओं ने भाजपा की गुटबाजी को जगजाहिर भी किया है।

इसके अलावा कई विधायकों का संगठन के निर्णयों से असहमति जताना खेमेबाजी को और बढ़ा रहा है। कई जिलों में स्थानीय नेतृत्व को दरकिनार करने की शिकायतें बढ़ी हैं। हालिया संगठनात्मक फेरबदल में कई वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी से असंतोष गहराया है।

🟢 असर

भाजपा की इस गुटबाजी से पार्टी की जमीनी एकजुटता कमजोर पड़ी है। 2024 में हुए 9 विधानसभा उपचुनावों में भाजपा 6 उपचुनाव हार गई। अगर आशीष, इंद्र दत्त लखनपाल या फिर सुधीर शर्मा भाजपा ज्वाइन कर उपचुनाव जीते भी तो इसमें उनका व्यक्तिगत वोटबैंक और रसूख जीत का फैक्टर बना । कांग्रेस सरकार पर हमले कमजोर पड़ते दिख रहे हैं क्योंकि भाजपा नेता एक-दूसरे पर ही निशाना साध रहे हैं। पार्टी के अंदर नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज हैं, जो जनता में असमंजस पैदा कर रही हैं।

🔵 राजनीतिक विश्लेषण

राजनीति के जानकार मानते हैं कि भाजपा की यह खेमेबाजी “सत्ता की प्रतीक्षा” का परिणाम है। जब पार्टी विपक्ष में होती है, तो नेतृत्व की महत्वाकांक्षा और संगठनात्मक असंतुलन बढ़ जाते हैं। हालांकि, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस खेमेबाजी को नियंत्रित करने की कोशिश में है।

🔵 निष्कर्ष

भाजपा यदि हिमाचल में दोबारा सत्ता हासिल करना चाहती है, तो उसे आंतरिक गुटबाजी खत्म कर एकजुट नेतृत्व, स्पष्ट रणनीति और कार्यकर्ता-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना होगा। अन्यथा, “एक हिमाचल – एक भाजपा” का नारा केवल नारों तक ही सीमित रह जाएगा।

 

 

 

Leave a Comment

error: Content is protected !!

Follow Us Now