

कड़े फैसलों का साहस, अनुशासन का प्रतीक: शांता कुमार ने हिमाचल की आर्थिक राह को किया मजबूत
रजनीश शर्मा। हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार राज्य के दो बार मुख्यमंत्री बने लेकिन दोनों बार उनका टेन्योर पूरा न हो पाया लेकिन वह आज भी कुछ कारणों से खास हैं।
- पहला कार्यकाल: 1977–1980
- दूसरा कार्यकाल: 1990–1992
दोनों ही बार उन्हें पूरा कार्यकाल नहीं मिल सका, लेकिन सीमित समय में लिए गए उनके फैसलों ने राज्य की वित्तीय सोच और प्रशासनिक संस्कृति पर स्थायी असर छोड़ा।
‘नो वर्क, नो पे’—ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय
शांता कुमार का सबसे चर्चित और निर्णायक कदम ‘नो वर्क, नो पे’ रहा। यह फैसला उस दौर में अभूतपूर्व था, जिसने सरकारी कर्मचारियों में जवाबदेही, अनुशासन और कार्य-संस्कृति को नई दिशा दी। अलोकप्रिय होने के बावजूद उन्होंने इसे जनहित में लागू किया—और यही उनकी पहचान बनी।
व्यय नियंत्रण और वित्तीय अनुशासन
राज्य की बिगड़ती वित्तीय हालत को देखते हुए उन्होंने गैर-जरूरी सरकारी खर्चों में कटौती की। अनुत्पादक मदों पर अंकुश, अनावश्यक अनुदानों की समीक्षा और बजट अनुशासन ने राजकोषीय संतुलन की नींव रखी। परिणामस्वरूप संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हुआ।
प्रशासनिक सख्ती से बढ़ी उत्पादकता
शांता कुमार के शासन में प्रशासनिक अनुशासन सर्वोच्च प्राथमिकता रहा। फाइल-सिस्टम में देरी, जिम्मेदारी से बचाव और ढिलाई पर सख्ती हुई। इससे न सिर्फ निर्णय-प्रक्रिया तेज़ हुई, बल्कि सरकारी मशीनरी की उत्पादकता भी बढ़ी।
दिल्ली में लड़ी प्रदेश की लड़ाई
राज्य हितों के लिए शांता कुमार ने दिल्ली तक आवाज़ बुलंद की। केंद्रीय स्तर पर हिमाचल के विशेष हित—वित्तीय सहायता, योजनाओं की मंज़ूरी और संसाधन—के लिए उन्होंने मजबूती से पैरवी की, ताकि पहाड़ी राज्य को विकास की बराबरी मिल सके।
कर्ज-मुक्ति की सोच, दूरगामी नीतियाँ
उनकी नीतियों का मूल उद्देश्य राज्य को कर्ज के जाल से निकालना था। राजस्व बढ़ाने, खर्च घटाने और वित्तीय अनुशासन से उन्होंने दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा तय की—भले ही इसके लिए तत्काल राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी।
आज की वित्तीय व्यवस्था के संदर्भ में प्रासंगिकता
आज जब प्रदेश बढ़ते कर्ज, वेतन-भत्तों के दबाव और राजकोषीय घाटे जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, शांता कुमार के सुधार और अधिक प्रासंगिक दिखते हैं।
- जवाबदेही आधारित प्रशासन
- खर्च पर सख्त नियंत्रण
- अलोकप्रिय लेकिन जनहितकारी निर्णय
ये सिद्धांत आज भी वित्तीय स्थिरता का रोडमैप प्रस्तुत करते हैं।
विरासत जो दिशा दिखाती है
पूरे कार्यकाल का अवसर न मिलने के बावजूद, शांता कुमार को वित्तीय सुधारों के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनके फैसले यह सिखाते हैं कि साहस, अनुशासन और दूरदृष्टि से ही राज्य की अर्थव्यवस्था को मज़बूत किया जा सकता है—चाहे चुनौतियाँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों।
आज के दौर में हिमाचल को जिन ठोस आर्थिक फैसलों की ज़रूरत है, उनकी झलक शांता कुमार के शासनकाल में मिलती है—यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।

Author: Polkhol News Himachal









