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16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट: हिमाचल में कम पूंजीगत खर्च, बढ़ता कर्ज बना चिंता का विषय

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16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट: हिमाचल में कम पूंजीगत खर्च, बढ़ता कर्ज बना चिंता का विषय

पोल खोल न्यूज़ डेस्क । शिमला


16वें वित्त आयोग ने अन्य राज्यों से तुलना करते हुए हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। आयोग के अनुसार हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और त्रिपुरा जैसे राज्य अपने बजट का अपेक्षाकृत बहुत छोटा हिस्सा पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर) पर खर्च कर रहे हैं, जबकि वेतन, सब्सिडी और ब्याज भुगतान जैसे बार-बार होने वाले खर्चों को प्राथमिकता दी जा रही है।

आयोग ने सिक्किम, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को पहाड़ी राज्यों में प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से अपेक्षाकृत अमीर राज्य माना है। रिपोर्ट के मुताबिक इन राज्यों ने पिछले कुछ दशकों में तेज आर्थिक विकास दर्ज किया है और यहां प्रति व्यक्ति आय भी अन्य पहाड़ी राज्यों की तुलना में अधिक रही है। इन राज्यों को केंद्र सरकार की ओर से औद्योगिक इकाइयों को दी गई टैक्स रियायतों का भी लाभ मिला है।

हालांकि, आयोग ने इसे विरोधाभासी स्थिति बताया है कि इसके बावजूद हिमाचल प्रदेश का कर्ज-से-जीएसडीपी अनुपात पूरी समीक्षा अवधि के दौरान 32 प्रतिशत से ऊपर बना रहा है। आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 के दौरान 2020-21 में यह अनुपात तेजी से बढ़कर 45 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इसके बाद 2021-22 में यह घटकर 40.8 प्रतिशत हुआ, लेकिन 2022-23 में फिर बढ़कर 42.7 प्रतिशत और 2023-24 में 42.8 प्रतिशत हो गया।

वित्त वर्ष 2023-24 में अरुणाचल प्रदेश अपने कुल खर्च का 29.2 प्रतिशत पूंजीगत परियोजनाओं पर खर्च कर पहाड़ी राज्यों में सबसे आगे रहा। इसके अलावा ओडिशा, गुजरात, झारखंड, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने भी अपने कुल खर्च का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कैपिटल मदों पर खर्च किया। वहीं पंजाब, आंध्र प्रदेश और राजस्थान ऐसे राज्य रहे, जिन्होंने पूंजीगत मदों पर 10 प्रतिशत से भी कम खर्च किया।

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पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों में भी इसी तरह का अंतर देखने को मिला। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और मेघालय कैपिटल खर्च में आगे रहे, जबकि मिजोरम, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा ने अपने बजट का काफी छोटा हिस्सा इस मद में खर्च किया। यह स्थिति दर्शाती है कि इन राज्यों में विकासात्मक खर्च की तुलना में सैलरी, सब्सिडी और ब्याज भुगतान जैसे खर्चों को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है।

रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश ने 2021-22 तक कई वर्षों तक रेवेन्यू सरप्लस बनाए रखा था, लेकिन तेरह साल की अवधि के अंतिम दो वर्षों में राज्य को भारी राजस्व घाटे का सामना करना पड़ा। वर्ष 2022-23 में यह घाटा जीएसडीपी का 3.3 प्रतिशत और 2023-24 में 2.6 प्रतिशत दर्ज किया गया। इसी अवधि में राज्य का राजकोषीय घाटा भी तेजी से बढ़कर 2022-23 में 6.4 प्रतिशत और 2023-24 में 5.3 प्रतिशत तक पहुंच गया।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि पहाड़ी और कम आबादी वाले राज्य आमतौर पर प्रति व्यक्ति आधार पर वेतन और प्रशासनिक मदों पर अधिक खर्च करते हैं, जबकि आर्थिक रूप से सीमित और कम आय वाले राज्यों को विकास कार्यों के लिए सीमित संसाधनों में संतुलन बनाना पड़ता है।

📌 इन्फो बॉक्स

हिमाचल प्रदेश: प्रमुख वित्तीय संकेतक (16वां वित्त आयोग)

कर्ज-से-जीएसडीपी अनुपात

2020-21: 45%

2021-22: 40.8%

2022-23: 42.7%

2023-24: 42.8%

रेवेन्यू घाटा

2022-23: 3.3%

2023-24: 2.6%

राजकोषीय घाटा

2022-23: 6.4%

2023-24: 5.3%

पूंजीगत खर्च में स्थिति

हिमाचल, मिजोरम, त्रिपुरा: पीछे

अरुणाचल, सिक्किम, मेघालय: आगे

टैक्स क्षमता वाले पहाड़ी राज्य

  • हिमाचल प्रदेश
  • असम
  • उत्तराखंड

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