
डंके की चोट पर : जिन हाथों ने राजकुमारों की तरह पाला, उन्हीं को बुढ़ापे में दर-दर की ठोकरें क्यों?
रजनीश शर्मा। हमीरपुर

माँ-बाप चाहे कितने ही गरीब क्यों न हों, अपनी संतान को कभी कमी महसूस नहीं होने देते। बचपन की छोटी-छोटी ज़रूरतों से लेकर जवानी के बड़े सपनों तक, वे अपनी हैसियत से कहीं आगे जाकर बच्चों को राजकुमारों की तरह पालते हैं।
लेकिन वही माँ-बाप जब बुढ़ापे की दहलीज़ पर सहारे की उम्मीद लेकर खड़े होते हैं, तो अक्सर उन्हें अपमान, उपेक्षा और तिरस्कार ही नसीब होता है। जिन कंधों पर बच्चों को बैठाकर दुनिया दिखाई, वही कंधे आज बोझ समझे जाने लगे हैं।
सम्मान नहीं दे पा रहे ‘बादशाहों’ को पालने वाले बेटे
दर्दनाक सच यह है कि आज लाखों की तनख़्वाह कमाने वाले बेटे-बहुएँ, अपने माँ-बाप को दो वक़्त की रोटी और इज़्ज़त तक देने में असमर्थ दिखते हैं।
लानत है ऐसी शिक्षा पर, जो इंसान को डिग्री तो दे दे लेकिन संस्कार छीन ले।
लानत है ऐसे समाज पर, जहाँ बूढ़े माँ-बाप की आँखों से बहते आँसू, बच्चों की चमचमाती गाड़ियों से कम क़ीमती समझे जाते हैं।

घर से बेघर होते माँ-बाप: तीन ही रास्ते बचते हैं
जब बेटे-बहुएँ घर से निकाल देते हैं, तो बुजुर्गों के पास सिर्फ़ तीन ही रास्ते बचते हैं—
- सड़क पर भीख,
- वृद्धाश्रम,
- या फिर तनाव में आत्महत्या।
यह सिर्फ़ आंकड़ा नहीं, बल्कि हर वह कहानी है जो समाज की आत्मा को झकझोर देती है।
वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या: सभ्यता के पतन का आईना

भारत में वृद्धाश्रमों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है।
2016 में जहाँ लगभग 500 पंजीकृत वृद्धाश्रम थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 1122 हो गई।
सिर्फ़ नौ वर्षों में यह दोगुनी वृद्धि इस बात का सबूत है कि हम अपनी जड़ें और संस्कार भूलते जा रहे हैं।
भारत के 28 राज्यों में शायद ही कोई राज्य हो जहाँ एक भी वृद्धाश्रम न हो।
- केरल में लगभग 124 वृद्धाश्रम
- महाराष्ट्र में 49 से अधिक वृद्धाश्रम
हिमाचल प्रदेश में भी चिंताजनक हालात
हिमाचल प्रदेश, जिसे देवभूमि कहा जाता है, वहाँ भी हालात अलग नहीं हैं।
प्रदेश में शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ अब ग्रामीण इलाकों से भी बुजुर्ग वृद्धाश्रमों का रुख कर रहे हैं।
शिमला, कांगड़ा, हमीरपुर, मंडी और सोलन जैसे ज़िलों में सरकारी व निजी वृद्धाश्रम संचालित हैं, जहाँ पहुँचने वाले अधिकतर बुजुर्गों की एक ही कहानी होती है—
“बेटा-बहू ने घर से निकाल दिया।”
गरीब नहीं, अमीर बच्चे माँ-बाप को छोड़ते हैं
रिपोर्ट्स बताती हैं कि वृद्धाश्रमों में रहने वाले बुजुर्गों को छोड़ने वाले बच्चों में अमीरों की संख्या ज़्यादा है।
गरीब घरों में आज भी माँ-बाप को भगवान माना जाता है।
आंकड़े बताते हैं कि—
- 50% वृद्ध माताएँ
- 45% वृद्ध पिता
अपने ही बेटों-बहुओं से मारपीट और भूख का शिकार होते हैं।
कानून क्या कहता है: अब संपत्ति पर हक़ नहीं!
2024 के बाद केंद्र सरकार ने बुजुर्गों के हित में कड़े कानूनी बदलाव किए हैं—
- माँ-बाप की स्वयं अर्जित संपत्ति पर बच्चों का कोई स्वतः अधिकार नहीं।
- माँ-बाप चाहें तो संपत्ति दान, सरकार, आश्रम या किसी अन्य व्यक्ति को दे सकते हैं।
- बेटियों को भी संपत्ति में समान अधिकार।
कानून का साफ़ संदेश है—
सेवा नहीं, तो संपत्ति नहीं।
सिंघानिया प्रकरण: समाज के लिए चेतावनी
रेमंड समूह के पूर्व मालिक विजयपत सिंघानिया को जिस तरह उनके ही बेटे ने संपत्ति से बेदख़ल किया, उसने पूरे देश को झकझोर दिया।
यह सिर्फ़ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच का उदाहरण है जो रिश्तों को सौदे में बदल चुकी है।
अब सख़्ती ज़रूरी है, सिर्फ़ संवेदना नहीं
यह समय केवल भाषणों का नहीं, कठोर कार्रवाई का है।
जो बच्चे माँ-बाप को घर से निकालते हैं—
- उन्हें पैतृक संपत्ति से वंचित किया जाए,
- मारपीट और उपेक्षा पर कठोर सज़ा तय हो,
- और पीड़ित बुजुर्गों को त्वरित न्याय मिले।
इन्फो बॉक्स : ज़रूरी जानकारी एक नज़र में

हिमाचल में वृद्धाश्रम
- सरकारी व निजी मिलाकर कई आश्रम सक्रिय
- ज़्यादातर बुजुर्ग घरेलू प्रताड़ना के शिकार
प्रमुख सरकारी प्रावधान
- माता-पिता की सेवा अनिवार्य
- सेवा न करने पर संपत्ति का अधिकार समाप्त
- भरण-पोषण न देने पर कानूनी कार्रवाई संभव
समाज के लिए संदेश
माँ-बाप बोझ नहीं,
वे हमारी पहचान और जड़ें हैं।
अंतिम शब्द
जिस समाज में माँ-बाप सुरक्षित नहीं, वह समाज कितना भी विकसित क्यों न कहलाए—वह अंदर से खोखला है।
अब सवाल सिर्फ़ कानून का नहीं, ज़मीर का है।
क्योंकि याद रखिए—
जो आज माँ-बाप के साथ कर रहे हैं, कल वही उनकी तक़दीर बन सकता है।

Author: Polkhol News Himachal










