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डंके की चोट पर : बीमारी में मौन, मौत पर नेताओं की सक्रिय राजनीति, पूरे हिमाचल में नया ट्रेंड 

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डंके की चोट पर : बीमारी में मौन, मौत पर नेताओं की सक्रिय राजनीति, पूरे हिमाचल में नया ट्रेंड 

रजनीश शर्मा। हमीरपुर

गांव का कोई बुजुर्ग पांच–पांच साल से चारपाई पर पड़ा हो, सांसें गिन रहा हो, इलाज के लिए परिवार दर-दर भटक रहा हो, नौजवान रोजगार के लिए भटक रहा है और निराश होकर दर दर की ठोकर खा रहा हो  , एंबुलेंस रोड न होने पर महिला  रास्ते में ही प्रसव पीड़ा में तड़फ रही है  — तब नेताओं के पास न वक्त होता है, न जानकारी, न संवेदना। उस समय नेताओं  का मोबाइल “नेटवर्क एरिया से बाहर” रहता है और चमचों की सूंघने की शक्ति भी अचानक खत्म हो जाती है।

मौत की खबर: सबसे तेज़ चलती है राजनीतिक एंबुलेंस

जैसे ही किसी गरीब या बुजुर्ग की मौत होती है, सूचना बिजली की रफ्तार से नेता जी तक पहुंचती है। आश्चर्य यह कि यह सूचना वही चमचे पहुंचाते हैं जिन्हें बीमारी के समय घर का  रास्ता तक नहीं सूझता था। मौत की खबर मिलते ही राजनीतिक एंबुलेंस स्टार्ट हो जाती है — सायरन नहीं, लेकिन प्रचार की पूरी तैयारी के साथ।


पहले चमचे, फिर नेता जी

नेता जी से पहले गांव में उनके चार-दस समर्थक पहुंच जाते हैं। कोई कुर्सी संभालता है, कोई सफेद चादर बिछाता है,  कोई पानी, कोई फोटो एंगल सेट करता है। शोकग्रस्त घर अब घर नहीं, “कार्यक्रम स्थल” बन जाता है। दुख कम और व्यवस्था ज्यादा नजर आती है।


चमचमाती गाड़ी, लटका चेहरा

फिर एंट्री होती है नेता जी की — चमचमाती गाड़ी से। चेहरे पर गहरा शोक, आंखों में अभ्यास का सन्नाटा। कुछ देर तक सिर झुकाए बैठे रहते हैं, ताकि फोटो में संवेदना साफ दिखे। इसके बाद पहला सवाल आता है —
“बीमार तो बहुत दिन से था?”
यानी मौत को भी प्रमाणपत्र चाहिए।


सांत्वना, चाय और राजनीति

फिर सांत्वना का औपचारिक दौर चलता है — वही घिसे-पिटे वाक्य, वही सीखी हुई संवेदनाएं। उसके बाद चाय-पानी और फिर बिना किसी संकोच के ताजा राजनीतिक हालात पर चर्चा। शोकग्रस्त परिवार की पीड़ा पृष्ठभूमि बन जाती है और राजनीति केंद्र में आ जाती है।


दरवाजे के बाहर जाते ही शोक समाप्त

जैसे ही नेता लोग शोकग्रस्त घर की देहरी लांघते हैं, चेहरा बदल जाता है। गाड़ी में बैठते ही शोक उतर जाता है और मुस्कान लौट आती है। मानो दुख एक पहनने-उतारने वाली जैकेट हो — घर के अंदर पहनी, बाहर उतारी।


पूरा हिमाचल, एक जैसा ट्रेंड

यह कोई एक गांव या एक नेता की कहानी नहीं रही। आज पूरे हिमाचल में यही ट्रेंड बन चुका है —
बीमारी में चुप्पी, मौत पर सक्रियता।
सेवा नहीं, सिर्फ़ उपस्थिति।
मदद नहीं, सिर्फ़ दिखावा।


असली सवाल: जब जिंदा आदमी तब नेता लोग कहां थे ? 

सवाल यह नहीं कि नेता लोग मरने वाले के घर क्यों जाते हैं।
सवाल यह है कि मरने से पहले ये नेता कहां होते हैं?
अगर बीमारी के समय हाल पूछ लिया जाता,
अगर बड़े अस्पताल में इलाज की कोशिश की जाती,
तो शायद किसी गरीब को बेहतर इलाज मिल जाता,
और शायद कोई मौत टल जाती।


संवेदना नहीं, सस्ती राजनीति

बीमार व्यक्ति नेताओं के लिए बोझ है,
लेकिन मौत उनके लिए अवसर।
यह राजनीति नहीं,
यह शोक पर खड़ी सस्ती संवेदना की दुकान है।

जब तक नेता बीमारी में नहीं,
बल्कि सिर्फ़ मौत पर दिखाई देते रहेंगे —
तब तक जनता को समझ लेना चाहिए
कि यह नेता नहीं, मौक़ापरस्त कलाकार हैं जो सिर्फ राजनीतिक रोटियां बटोरने आपके पास आता है।  हां , सड़क , स्वास्थ्य , एंबुलेंस रोड या फिर व्हील चेयर रोड  नेताओं की प्राथमिकताओं में शामिल है तो  वही सच्ची संवेदना लोगों के साथ मानी जानी चाहिए ।

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