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डंके की चोट पर: अग्निकांड की आग में झुलसती देवभूमि, यह सिर्फ हादसे नहीं, पूरे सिस्टम की नाकामी का आईना हैं

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  • डंके की चोट पर: अग्निकांड की आग में झुलसती देवभूमि 

  • यह सिर्फ हादसे नहीं, पूरे सिस्टम की नाकामी का आईना हैं

रजनीश शर्मा। हमीरपुर 

हिमाचल प्रदेश आज एक गंभीर और डरावने संकट के दौर से गुजर रहा है। देवभूमि कहलाने वाला यह पहाड़ी राज्य लगातार बढ़ते अग्निकांडों से झुलस रहा है। मौसम कोई भी हो—सर्द रातें हों या तपती गर्मी—आग की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं। हर नई घटना सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगियों और पूरे सिस्टम की पोल खोल रही है।


🔴 एक के बाद एक अग्निकांड: सवालों के घेरे में व्यवस्था

बीते कुछ ही दिनों में हिमाचल में ऐसे-ऐसे अग्निकांड सामने आए, जिन्होंने पूरे प्रदेश को हिला दिया। कहीं रिहायशी मकान पलभर में राख हो गए, तो कहीं जंगलों में उठती आग ने पर्यावरण को निगल लिया। यह महज संयोग नहीं, बल्कि एक खतरनाक सिलसिले की ओर इशारा है।


⚫ अर्की अग्निकांड: जब चार दिन बाद भी मलबा बोलता रहा

अर्की में हुए दर्दनाक अग्निकांड के चार दिन बाद भी राहत एवं बचाव कार्य जारी रहा। मलबे में दबे शवों के अवशेष तलाशे जाते रहे और अब भी पूरी जांच शेष है। यह हादसा कई सवाल छोड़ गया—क्या सुरक्षा मानकों की अनदेखी नहीं हुई? क्या समय रहते खतरे को टाला जा सकता था?


⚫ तलंगाना गांव: नींद में जिंदा जल गया पूरा परिवार

सिरमौर जिले के तलंगाना गांव में हुई घटना ने इंसानियत को झकझोर दिया। घर के अंदर सो रहे छह लोग जिंदा जल गए। बाहर निकलने तक का मौका नहीं मिला। आठ में से सिर्फ दो लोग बच पाए। यह हादसा बताता है कि आग कब और कैसे मौत बनकर आएगी, कोई नहीं जानता।


⚫ सुंदरनगर: रसोई की आग बनी मौत का कारण

बीते रविवार सुंदरनगर में देर रात रसोई में लगी आग ने 85 वर्षीय वृद्ध महिला की जान ले ली। छोटे-छोटे हादसे अब बड़े सवाल बन चुके हैं।


📉 4–5 दिन, 15 से ज्यादा मौतें: डरावना सच

महज 4 से 5 दिनों के भीतर अग्निकांडों में 15 से अधिक लोगों की जान चली गई। कई परिवार उजड़ गए और ऐसे जख्म मिले जो कभी नहीं भरेंगे।


📊 एक साल का हिसाब: आंकड़े खुद बोल रहे हैं

जनवरी 2025 से दिसंबर 2025 तक:

  • सैकड़ों नहीं, हजारों अग्निकांड
  • 402 घर आग की चपेट में
  • 1600 से ज्यादा जंगलों में आग
  • 57 उद्योग प्रभावित
  • करोड़ों-अरबों की संपत्ति राख

सरकारी आंकड़ों के अनुसार बीते साल 6 मौतें दर्ज हुईं और 299 लोगों को बचाया गया। लेकिन सवाल यह है—क्या ये आंकड़े असल भयावहता दिखाते हैं?


🚒 फायर सर्विस: जांबाज, लेकिन बेबस

इसमें कोई शक नहीं कि फायर सर्विस हर बार सबसे आगे खड़ी दिखती है। जान जोखिम में डालकर ये कर्मी लोगों को बचाते हैं।
लेकिन सच्चाई यह भी है:

  • दुर्गम इलाकों तक पहुंचने में देरी
  • फायर स्टेशन की दूरी
  • स्टाफ और आधुनिक संसाधनों की कमी
  • संकरी सड़कें और पानी की भारी किल्लत

जब तक टीम पहुंचती है, तब तक सब कुछ खत्म हो चुका होता है।


⚡ लापरवाही: हादसों की सबसे बड़ी जड़

अधिकांश अग्निकांड इंसानी लापरवाही का नतीजा हैं:

  • सर्दियों में अंगीठी जलाकर सो जाना
  • गैस सिलेंडरों का अवैध भंडारण
  • शॉर्ट सर्किट, पुराने तार, ओवरलोडिंग
  • अवैध बिजली कनेक्शन
  • लकड़ी के मकान, जिनमें आग तेजी से फैलती है

अर्की अग्निकांड में भी यही वजह सामने आई—अंगीठी और अवैध सिलेंडर।


💧 पानी ही नहीं, तैयारी भी नदारद

आग बुझाने का सबसे बड़ा हथियार पानी है, लेकिन:

  • कई जगह हाइड्रेंट काम नहीं करते
  • पाइपलाइन प्रेशर बेहद कम
  • कई क्षेत्रों में हाइड्रेंट हैं ही नहीं

यह स्थिति जल शक्ति विभाग की तैयारियों पर सवाल खड़े करती है।


🌲 जंगलों की आग: पर्यावरण पर सीधा हमला

बीड़ी-सिगरेट, जानबूझकर घास जलाना और मौसम की मार—जंगलों में आग आम हो चुकी है। दुर्गम पहाड़ी इलाकों में आग बुझाना फायर सर्विस और वन विभाग के लिए किसी युद्ध से कम नहीं।


❓ चार बड़े सवाल, जिनसे बचा नहीं जा सकता

  1. क्या हिमाचल में फायर सर्विस को आधुनिक संसाधनों की सख्त जरूरत है?
  2. क्या बिजली बोर्ड को रखरखाव और जन-जागरूकता बढ़ानी होगी?
  3. क्या जल शक्ति विभाग आपात स्थितियों के लिए वास्तव में तैयार है?
  4. और सबसे अहम—क्या आम नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझेगा?


📌 इन्फो बॉक्स | अग्निकांड रोकने के लिए जरूरी कदम

  • अंगीठी/हीटर जलाकर कभी न सोएं
  • गैस सिलेंडर का अवैध भंडारण न करें
  • समय-समय पर बिजली वायरिंग की जांच
  • हाइड्रेंट और पानी के स्रोतों की नियमित जांच
  • जंगलों में आग लगाने जैसी हरकतों से बचें
  • आपात स्थिति में तुरंत सूचना दें

🧨 निष्कर्ष: यह हादसे नहीं, सिस्टम की परीक्षा हैं

ये अग्निकांड सिर्फ दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि पूरे सिस्टम की अग्निपरीक्षा हैं।
अगर अब भी गंभीरता नहीं दिखाई गई, तो आने वाला समय हिमाचल के लिए और भी भयावह साबित हो सकता है।
सवाल साफ है—क्या हम जागेंगे, या अगली आग किसी और की जिंदगी लील लेगी?

 

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