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चांदनी रातों में गूंज रहे चरकटी गीत — परंपरा निभा रहे सुरेश और उनके साथी, भीष्म पंचक व गुरु नानक जयंती से जुड़ा आध्यात्मिक महत्व

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चांदनी रातों में गूंज रहे चरकटी गीत — परंपरा निभा रहे सुरेश और उनके साथी, भीष्म पंचक व गुरु नानक जयंती से जुड़ा आध्यात्मिक महत्व

रजनीश शर्मा। हमीरपुर

कार्तिक माह की पूर्णिमा के आगमन के साथ ही हिमाचल के ग्रामीण क्षेत्रों में चरकटी गायन की परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी है। बमसन क्षेत्र के सुरेश कुमार और उनके साथी वर्षों से इस लोक परंपरा को संजोए हुए हैं और आज भी चांदनी रातों में गांव-गांव जाकर चरकटी गीतों के माध्यम से भक्ति और सांस्कृतिक संदेश फैलाते हैं।

चंद्रमा की रोशनी में लोकभक्ति का संगम

कार्तिक माह की रात्रियों में जब पूरा आकाश चांदनी से नहाया होता है, तब सुरेश और उनका दल चरकटी गीत गाते हैं। यह परंपरा न केवल लोक संगीत की धरोहर है, बल्कि इसमें भक्ति, सदाचार, और लोकसंस्कारों का सुंदर समावेश होता है। चरकटी गीतों में भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण, शिव, माता पार्वती और स्थानीय देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है।

भीष्म पंचक और गुरु नानक जयंती से जुड़ा महत्व

कार्तिक मास के अंतिम पांच दिन जिन्हें भीष्म पंचक कहा जाता है, उनमें चरकटी गायन का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भीष्म पितामह ने इन्हीं दिनों गंगा तट पर शरशय्या पर भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनों के साथ अपने प्राण त्यागे थे। इसी अवधि में गुरु नानक देव जी की जयंती भी आती है, जिससे इस लोक परंपरा का आध्यात्मिक स्वर और भी गहरा हो जाता है। चरकटी गीतों में गुरु नानक देव जी के उपदेश — “नाम जपो, किरत करो, वंड छको” — जैसी शिक्षाओं का भावात्मक उल्लेख किया जाता है।

लोक संस्कृति के रक्षक बने सुरेश और दल

सुरेश कुमार बताते हैं, “हम बचपन से अपने बड़ों को चरकटी गाते सुनते आए हैं। अब हमारा उद्देश्य इस विरासत को आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाना है।”

ग्रामीण समाज में मेल-जोल का प्रतीक

चरकटी गायन केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। गांवों में लोग एकत्र होकर देर रात तक इन गीतों का आनंद लेते हैं, जिससे भाईचारा और परस्पर सहयोग की भावना बढ़ती है।

कार्तिक मास की चांदनी रातों में जब हवा में ठंडक घुली होती है और गांव की गलियों में ढोलक की थाप गूंजती है, तब चरकटी गीत हिमाचल की उस जीवंत संस्कृति का स्मरण कराते हैं जो भक्ति, लोककला और सामूहिक एकता का संगम है। सुरेश और उनके साथी न केवल संगीतकार हैं, बल्कि परंपरा के सच्चे रक्षक भी हैं जो हिमाचल की लोक आत्मा को सजीव बनाए हुए हैं।

 

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