

देशभर में खत्म होने के बाद शुरू होता है कुल्लू का दशहरा, देवपरंपरा का अद्भुत संगम देखते हैं देश विदेश के लोग
कुल्लू में 2 अक्टूबर से अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव शुरू होगा, जो 7 दिन तक चलेगा
पोल खोल न्यूज डेस्क । हमीरपुर

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में विजयदशमी से ही दशहरा उत्सव की शुरुआत होती है। जिसके बाद 7 दिनों तक यहां पर धूमधाम से अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव मनाया जाता है। यहां रावण कुंभकरण या फिर मेघनाथ के पुतले नहीं जलाए जाते।
कुल्लू दशहरे का महत्व

कुल्लू में विजयदशमी के बाद दशहरा मनाने के पीछे एक तर्क यह भी है कि विजयदशमी के दिन श्री राम की सेना ने रावण की सेना पर विजय पाई थी और आश्विन मास की पूर्णिमा की रात्रि रावण ने अपने प्राण त्यागे थे। पहले यहां पर दशहरा उत्सव विजयदशमी से लेकर पूर्णिमा तक मनाया जाता था, लेकिन बाद में इसका स्वरूप बदल गया और अब इसे 7 दिनों तक मनाया जा रहा है।
युद्ध के दौरान विजयदशमी के दिन भगवान राम ने रावण की नाभि पर तीर मारा था और रावण की सेना पर जीत हासिल की थी। तब से लेकर पूरे भारत में विजयदशमी का त्योहार मनाया जाता है, लेकिन रावण की मृत्यु विजयदशमी के पूर्णिमा के दिन हुई थी। हालांकि दशहरा उत्सव पहले विजयदशमी से लेकर पूर्णिमा तक मनाया जाता था, लेकिन बाद में सभी की सहमति से अब कुल्लू का विश्व प्रसिद्ध दशहरा 7 दिन तक मनाया जाता है।
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रावण शिव भक्त और महाज्ञाता
रामायण के अनुसार लंकापति रावण महान शिव भक्त होने के साथ-साथ महाज्ञानी और पंडित था। रावण को शास्त्रों से लेकर वेदों और राजनीति से लेकर संगीत तक का ज्ञान था। युद्ध में हारने के बाद रावण जब मृत्यु शय्या पर था तो भगवान राम ने लक्ष्मण को शिक्षा लेने के लिए भेजा था। बाण लगने के बाद पूर्णिमा तक लक्ष्मण ने रावण से शिक्षा ली थी।
भगवान रघुनाथ को समर्पित दशहरा उत्सव
जिला कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर में आयोजित इस दशहरे की सबसे खास बात ये है कि देशभर में विजय दशमी या दशहरा खत्म होने के बाद कुल्लू का दशहरा शुरू होता है और एक हफ्ते तक चलता है। हर साल मनाया जाने वाला कुल्लू दशहरा अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से शुरू होकर एक हफ्ते तक चलता है। इस बार कुल्लू दशहरे का आगाज 2 अक्टूबर को और समापन 8 अक्टूबर को होगा। दशहरा उत्सव जिला कुल्लू के मुख्य देवता भगवान रघुनाथ जी को समर्पित है।

मूर्तियों के दर्शन से खत्म हुआ था राजा का रोग
कुल्लू के मंदिर में मौजूद भगवान रघुनाथ और माता सीता की मूर्तियों को भगवान रघुनाथ जी ने अश्वमेध यज्ञ के समय अपने हाथों से बनाया था। इन मूर्तियों के दर्शन के बाद कुल्लू के राजा जगत सिंह का रोग खत्म हो गया था और स्वस्थ होने के बाद राजा ने अपना जीवन और राज्य भगवान रघुनाथ को समर्पित कर दिया था। उसके बाद यहां दशहरे की शुरुआत हुई। कुल्लू के रघुनाथ मंदिर में भगवान रघुनाथ और सीता माता की मूर्तियां तो हैं, लेकिन लक्ष्मण की मूर्ति यहां मौजूद नहीं है। बाद में मंदिर में जरूर हनुमान जी की मूर्ति को भी रखा गया है।
Author: Polkhol News Himachal









